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Wednesday, 24 May 2017

हरि ॐ

*कितने करिशमाई हैं ये शब्द* 
           *" हरि ॐ  "*

*हरि ॐ  कहने से*-- मन हलका हो जाता है !

*हरि ॐ  कहने से--*नकारात्मक विचार नहीं आते !

*हरि ॐ कहने से--* पीड़ा शांत हो जाती है !

*हरि ॐ  कहने से---* खुशी उमड़ पड़ती है !

*हरि ॐ  कहने से--*गम कोसो दूर चले जाता है !

*हरि ॐ कहने से --* मान सम्मान बढ जाता है !

*हरि ॐ कहने से--*  ताज़गी का एह्सास होता है !

*हरि ॐ कहने से--* बिगड़े काम बनते हैं !

*हरि ॐ कहने से--* भजन सुमरन समृद्धि आती है !

*हरि ॐ  कहने से--*मानसिक बल मिलता है !
*हरि ॐ   कहने से--* मोक्ष और मुक्ति मिलती है !

*हरि ॐ कहने से--*  हर सपने साकार होते हैं !!



    हरि ॐ 

Saturday, 20 February 2016

जय जय हरि-हृदया वृषभानु-सुकुमारी॥

जय जय हरि-हृदया वृषभानु-सुकुमारी॥
बिजुरि बरन गौर बदन, सोहत तन नील बसन,
बिंब अधर मधुर हँसन, माधव-मन-हारी।
सुषमामय अंग-‌अंग, लि‌एँ मधुर सखिन संग,
बिहरत भरि मन उमंग प्रियतम-सुखकारी॥

लोक-बेद-लाज त्यागि, त्यागि स्वजन महाभाग,
हरि-हित गावत बिहाग, डोलत मतवारी।
प्रियतम-सुख-जल-सुमीन, निज-सुख-बांछा बिहीन,
गुननिधि, पै बनी दीन, राधिका दुलारी॥

जय जय श्री राधे! जय जय श्री राधे! जय जय श्री राधे!

"पद रत्नाकर "

श्रद्धेय भाई जी श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी
गीताप्रेस गोरखपुर भारत पुस्तक कोड-५०

Monday, 1 February 2016

बोल हरि बोल, हरि हरि बोल, केशव माधव गोविन्द बोल॥


नाम प्रभु का है सुखकारी, पाप कटेंगे क्षण में भारी।
नाम का पीले अमृत घोल, केशव माधव गोविन्द बोल॥

शबरी अहिल्या सदन कसाई, नाम जपन से मुक्ति पाई।
नाम की महिमा है बेतोल , केशव माधव गोविन्द बोल॥

सुवा पढ़ावत गणिका तारी, बड़े-बड़े निशिचर संहारी।
गिन-गिन पापी तारे तोल, केशव माधव गोविन्द बोल॥

नरसी भगत की हुण्डी सिकारी, बन गयो साँवलशाह बनवारी।
कुण्डी अपने मन की खोल, केशव माधव गोविन्द बोल॥

जो-जो शरण पड़े प्रभु तारे, भवसागर से पार उतारे।
बन्दे तेरा क्या लगता है मोल, केशव माधव गोविन्द बोल॥

राम-नाम के सब अधिकारी बालक वृध्द युवा नर नारी।
हरि जप इत-उत कबहुँ न डोल, केशव माधव गोविन्द बोल ।।

चक्रधारी भज हर गोविन्दम्, मुक्तिदायक परमानन्दम्।
हरदम कृष्ण मुरारी बोल, केशव माधव गोविन्द बोल ।।

रट ले मन ! तू आठों याम, राम नाम में लगे न दाम।
जन्म गवाँता क्यों अनमोल, केशव माधव गोविन्द बोल॥

अर्जुन का रथ आप चलाया, गीता कह कर ज्ञान सुनाया।
बोल, बोल हित-चित से बोल, केशव माधव गोविन्द बोल॥

Thursday, 17 December 2015

भाग्य स्वयं का स्वयं खुद , लिखता है इन्सान ।

भाग्य स्वयं का स्वयं खुद , लिखता है इन्सान ।
ना तो बृह्माजी लिखें , और न आ भगवान।।
जो जैसे इस जन्म में , कर जाएगा काम।
विधि उसके अनुरूप ही , लिख भेजे " रोटीराम "।।

चार कदम भी चल पडें , गर हम " उनकी " ओर।
" उन्हें " बनाकर चन्द्रमा , खुद बन जायँ चकोर।।
तो हरि भी नहीं रह सकें , आऐं नंगे पांव।
क्या ? ध्रुव को अरु द्रोपदी , नहीं आए "रोटीराम "।

काया सुख रस - भोग में , आज भ्रमित संसार।
ठान के खुद से दुश्मनी , भूला सद् आचार ।।
अब पाने परमात्म सुख , करे न कोई काम ।
भूला नरतन हेतु को , सो भ्रमित है " रोटीराम "।।

हरि की लीला - रूप - गुण , जो न कर रहे याद।
वे व्यक्ति यह स्वाँस धन , कर रहे हैं बर्बाद।।
पा नरतन जैसी निधि , गर न किए सत्काम।
तो यह अपना दुर्भाग्य है , अतिशय "रोटीराम "।

Thursday, 22 October 2015

यौवन भोगों में गया , प्रौढापन घर फिक्र ।

यौवन   भोगों    में   गया  ,  प्रौढापन    घर   फिक्र ।
        बृद्ध  हुआ  तब  भी नहीं  , हरि सुमिरन  की जिक्र।।
           तो कह  तो  सही , किस  उम्र में, जापेगा हरिनाम।
             मिल तो नहीं गई अमरता , तुझको  " रोटीराम "।
     या  फिर  शक   है  मृत्यु  में , या  यम  लिया  पटाय।
       ले  नोटों  की  गड्डियां  , आकार  भी  फिर  जाय।।
         अगर नहीं तो क्यों? भला , यूँ  रहा  स्वाँस गंवाय।
           वहाँ काम नहीं गड्डियां ,हरि सुमिरन ही आय।।

  चारों    तरफा    घर   पडे  ,  बृद्ध   झेल   रहे   मार।
        तानों की और व्यंग्य की , कभी  - कभी फटकार।।
           फिर भी ज्यादातर नहीं , अक्ल  से  ले रहे काम।
             सह लेते  चुपचाप  सब , हो  आसक्ति  गुलाम।।
    यही   भूल   देगी   दिला  ,  उनको    फिर    भवपीर।
       वे  लिख, नहीं  जा  पाऐंगे , खुद ,खुद की तकदीर।।
         काश ! अक्ल से काम ले, वे जा जपते कहीं "नाम "
           तो  पा  जाते  सद् गति , नर्क  न  " रोटीराम "।।

Sunday, 18 October 2015

हरि के नाम बिना झूठे सगल पसारे :

हरि के नाम बिना झूठे सगल पसारे :
हरि नाम सुमिरन बिना सारी क्रियाएँ व्यर्थ हैं झूठे हैं |
हे मुरारी तेरा नामजप ही मेरे लिये आरती है और स्नान भी तेरा ही नाम हैै....
पूजा का आसन तेरा नाम है प्रभु...
नाम ही चंदन घिसने वाला चकला(पत्थर) है 
और तेरा नाम ही, हे मुरारी, केसर है जिसे मैने तुझ पर छिड.का है....
नाम जल से तेरे नाम रूपी चंदन को मैने आपको लगाया है 
मेरे प्रभु....
मैने तेरे नाम को दीपक बनाकर उसमें नाम की बाती लगाई है...
प्रभु तेरे नाम को तेल बनाकर मैने पूजा की ज्योति जलाई है जिससे सब लोकों में ग्यान का प्रकाश फैले और अंधकार दूर हो गया है...
हे मुरारी तेरा नाम ही धागा है और फूलमाला भी तेरा नाम ही तो
है वरना फूल वगैरह सब भँवरों के जूठे किये हुए हैं 
इसलिये तुझे तेरे नाम रूपी फूल अर्पण किये हैं....
हे मेरे नाथ सब कुछ तेरा ही दिया हुआ है, 
तुझे मैं क्या अर्पण कर सकता हूँ.....
तेरा ही नाम चँवर है तू ही अपने को चँवर ढुलाने वाला है....
मैं तो कुछ भी नहीं हूँ...
सभी पुराण,  तीर्थं और चारों धाम तेरे नाम में ही समाये हैं...
तेरा नाम ही तो तेरी आरती की सारी सामग्री है....मेरे भगवन!
तेरे नाम को ही मैं भोग बनाकर तुझे चढा रहा हूँ....
हे मुरारी तेरे नाम के जप के बिना सभी कुछ थोथा है व्यर्थ है..