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Sunday, 20 December 2015

रहकर घर - परिवार में , नहीं

रहकर घर - परिवार में , नहीं डालोगे झाग।
देख हानि सन्तान की , नहीं डालोगे झाग।
यह सम्भव है ही नहीं , विल्कुल " रोटीराम "।
क्योंकि हृदय तो रोएगा, जब फुंकते देखे दाम।।
चूँकि आपमें जान है , सो बोलोगे ही आप।
कैसे ? चुप रह पाओगे , आखिर में हो बाप।।
इसको ही गीता कहे , मानव मन का राग।
रागावश ही डालता , है हर व्यक्ति झाग।।

उदासीन रह जगत से , मत हो ज्यादा लिप्त।
हल्का सा सम्बन्ध रख , बोलचाल संक्षिप्त।।
वह भी बस व्यवहार को , चल सा जाऐ काम।
ऊर्ध्वगति होकर रहे , इससे " रोटीराम "।।
इसके उल्टे जो रहें , घर में बहु मशगूल।
वे भक्ति - भगवान को , विल्कुल जाते भूल।।
सन्तति ममता मोहवश,वे जप नहीं पाते " नाम "।
सो दुर्गति को प्राप्त हों,पा सूकर - कूकर चाम।।

Saturday, 14 November 2015

कफन में जब,होती नहीं ,जेब

कफन में जब,होती नहीं ,जेब ओ! "रोटीराम"।
        तो क्यों?,संग्रह में लगा, पिला पडा है काम।।
         इससे तुझको लाभ क्या,जब जाना ही नहीं संग।
          गलत अगर कुछ हो गया, तो मृत्यु ,मुफ्त बदरंग।।
       क्यों? फिर जनम बिगाडता,कर बेमतलब के काम।
      जिम्मे तो पट ही चुके, क्या?करना फिर दाम।।
        मत भूले हरिनाम तो , ले जा सकता साथ।
        फिर क्यों नहीं जोडे इसे,जाए समां अनाथ।।
शास्त्र  बताई राह  पर , बढ  जाते  जिन  पैर।
         वे  फिर रह  पाते  नहीं, हरि  के नाम बगैर।।
      क्योंकि शास्त्र की सीख से,लें वे तत्व निकाल।
          कि भोगों से नहीं , भक्ति  से, ही  हो  सकूँ निहाल।।
      हैं  प्रमाण , तुलसी  हुए  , मीरा - सूर - कबीर।
       और हजारों , दे रहा , हमको  शास्त्र नजीर।।
     फिर क्यों वह गलती करे,क्यों न जपे हरिनाम।
       फिर वह घर, रुकता नहीं,बढले" रोटीराम "।।

Saturday, 7 November 2015

अधिक दिनों तक अब नहीं , चलनी है यह देह ।

अधिक दिनों तक अब नहीं , चलनी है यह देह ।
उनकी जो बूढे हुए , तनिक नहीं सन्देह ।।
क्योंकि पक चुका आम यह, आज नहीं तो काल।
टपकेगा ही Sure है , तज कर अपनी डाल।।
सो संशय तज अब जपें , बूढे भगवन्नाम।
क्या ? आने हैं काम अब , पुत्रादिक - सुख - दाम।।
वानप्रस्थ की आयु तो , करने को उद्धार।
" रोटीराम " न चूकिऐ , हो लो भव से पार।।
जिसे अहैतुकी भक्ति का , रुतबा देते शास्त्र।
जिसको कर इन्सान हो , परम धाम का पात्र।।
उसको करने के लिए , जब हों अपुन प्रयास।।
तब ही जा, इस देह की, कुछ उपलब्धि खास।।
इससे कमतर पर नहीं , हो पाना कल्यान।
मात्र भक्त कहलाऐंगे , दूर रहें भगवान।।
भले युगों तक जप करो ,पा - पाकर नरचाम।
बात बनेगी तो तभी , प्रथम न "रोटीराम "।।

Thursday, 5 November 2015

मानव-जन्म सुदुर्लभ पाकर

।। श्री हरि ।।

मानव-जन्म सुदुर्लभ पाकर, भजे नहीं मैंने भगवान।
रचा-पचा मैं रहा निरन्तर, मिथ्या भोगोंमें सुख मान॥
मान लिया मैंने जीवनका लक्ष्य एक इन्द्रिय-सुख-भोग।
बढ़ते रहे सहज ही इससे नये-नये तन-मनके रोग॥
बढ़ता रहा नित्य कामज्वर, ममता-राग-मोह-मद-मान।
हु‌ई आत्म-विस्मृति, छाया उन्माद, मिट गया सारा जान॥
केवल आ बस गया चिामें राग-द्वेष-पूर्ण संसार।
हु‌ए उदय जीवनमें लाखों घोर पतनके हेतु विकार॥
समझा मैंने पुण्य पापको, ध्रुव विनाशको बड़ा विकास।
लोभ-क्रएध-द्वेष-हिंसावश जाग उठा अघमें उल्लास॥
जलने लगा हृदयमें दारुण अनल, मिट गयी सारी शान्ति।
दभ हो गया जीवन-सबल, छायी अमित अमिट-सी भ्रान्ति॥
जीवन-संध्या हु‌ई, आ गया इस जीवनका अन्तिम काल।
तब भी नहीं चेतना आयी, टूटा नहीं मोह-जंजाल॥
प्रभो! कृपा कर अब इस पामर, पथभ्रष्टस्न्पर सहज उदार।
चरण-शरणमें लेकर कर दो, नाथ! अधमका अब उद्धार॥

पूज्य हनुमानप्रसादजी पोद्दार
संग्रह: पद-रत्नाकर