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Wednesday, 18 November 2015

हे दयामय! दीनबन्धो! दीन को अपना‌इये।

हे दयामय! दीनबन्धो! दीन को अपना‌इये।
डूबता बेड़ा मेरा मझदार पार लँघा‌इये॥
नाथ! तुम तो पतितपावन, मैं पतित सबसे बड़ा।
कीजिये पावन मुझे मैं शरणमें हूँ आ पड़ा॥
तुम गरीब-निवाज हो, यों जगत सारा कह रहा।
मैं गरीब अनाथ दुःख-प्रवाहमें नित बह रहा॥
इस गरीबीसे छुड़ाकर कीजिये मुझको सनाथ।
तुम-सरीखे नाथ पा, फिर क्यों कहाऊँ मैं अनाथ ?॥
हो तृषित आकुल अमित प्रभु! चाहता जो बूँद-नीर।
तुम तृषाहारी अनोखे उसे देते सुधा-क्षीर॥
यह तुम्हारी अमित महिमा सत्य सारी है प्रभो!।
किसलिये मैं रहा वचित फिर अभीतक हे विभो!॥
अब नहीं ऐसा उचित प्रभु! कृपा मुझपर कीजिये।
पापका बन्धन छुड़ा नित-शान्ति मुझको दीजिये॥

पूज्य हनुमानप्रसादजी पोद्दार
संग्रह: पद-रत्नाकर

नारायण । नारायण ।