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Sunday, 24 January 2016

मेरे हे जीवन-जीवन! मेरे हे जीवनके रस!

मेरे हे जीवन-जीवन! मेरे हे जीवनके रस!
मेरे हे भीतर-बाहर! मेरे हे केवल सरबस!
मैं नहीं जानती कुछ भी अतिरिक्त तुहारे प्रियतम!
मैं नहीं मानती कुछ भी बस, तुहें छोडक़र प्रियतम!
हर सभी पृथकता, मेरे रह गये एक तुम-ही-तुम।
कर आत्मसात्‌ ’मैं-मेरा’ सब कुछ अपनेमें ही तुम॥
अब तुहीं सोचते-करते सब ’मैं’ ’मेरा’ मुझमें बन।
नित तुहीं खेलते रहते बन मेरे चिा-बुद्धि-मन॥
आनन्द मुझे तुम देते नित बने पृथक्‌ लीलामय!
अपनेमें अपनेसे ही तुम होते प्रकट कभी लय॥
नित मिलन बिरहकी लीला चलती यों सतत अपरिमित।
होते सब खेल अनोखे नित सुख-वाछासे विरहित॥
मैं कहूँ अलग क्या प्रियतम! कहते हो तुम ही सब कुछ।
सुनते भी तुम ही हो सब, तुम ही हो, मैं हूँ जो कुछ॥
बैठी निकुजमें आली! थी ध्यानमग्र सब कुछ तज।
एकान्त हृदय-मन्दिरमें यों थी मैं रही उन्हें भज॥
मेरे मनकी ये बातें सुनकर वे प्यारे मोहन।
हो गये प्रकट यमुना-तटकी उस निकुजमें सोहन॥
उरसे अन्तर्हित सहसा हो गये प्राण जीवनधन।
व्याकुलता उदय हु‌ई अति, खुल गये नेत्र बस, तत्क्षण॥
वे देख रहे थे मुझको रसभरे दृगोंसे अपलक।
मिलनेकी उठी हृदयमें अत्यन्त तीव्रतम सु-ललक॥
बस, मुझे लगा ली उरसे निज स्वयं भुजा‌ओंमें भर।
रसभरे दृगोंसे आँसू बह चले प्रेमके झर-झर॥

पदरत्नाकर

नारायण । नारायण ।

Monday, 30 November 2015

हे स्वामी! अनन्य अवलबन, हे मेरे जीवन-‌ आधार।

हे स्वामी! अनन्य अवलबन, हे मेरे जीवन-‌ आधार।
तेरी दया अहैतुकपर निर्भरकर आन पड़ा हूँ द्वार॥
जाऊँ कहाँ जगतमें तेरे सिवा न शरणद है को‌ई।
भटका, परख चुका सबको, कुछ मिला न, अपनी पत खो‌ई॥
रखना दूर, किसीने मुझसे अपनी नजर नहीं जोड़ी।
अति हित किया-सत्य समझाया, सब मिथ्या प्रतीति तोड़ी॥
हु‌आ निराश, उदास, गया विश्वास जगतके भोगोंका।
जिनके लिये खो दिया जीवन, पता लगा उन लोगोंका॥
अब तो नहीं दीखता मुझको तेरे सिवा सहारा और।
जल-जहाजका कौ‌आ जैसे पाता नहीं दूसरी ठौर॥
करुणाकर! करुणाकर सत्वर अब तो दे मन्दिर-पट खोल।
बाँकी झाँकी नाथ! दिखाकर तनिक सुना दे मीठे बोल॥
गूँज उठे प्रत्येक रोममें परम मधुर वह दिव्य स्वर।
हृान्त्री बज उठे साथ ही मिला उसीमें अपना सुर॥
तन पुलकित हो, सु-मन जलजकी खिल जायें सारी कलियाँ।
चरण मृदुल बन मधुप उसीमें करते रहें रंगरलियाँ॥
हो जाऊँ उन्मा, भूल जाऊँ तन-मनकी सुधि सारी।
देखूँ फिर कण-कणमें तेरी छबि नव-नीरद-घन प्यारी॥
हे स्वामिन्‌! तेरा सेवक बन तेरे बल होऊँ बलवान।
पाप-ताप छिप जायें हो भयभीत मुझे तेरा जन जान॥

पूज्य हनुमानप्रसादजी पोद्दार
संग्रह: पद-रत्नाकर

नारायण । नारायण ।