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Wednesday, 22 March 2017

श्री कृष्ण स्तुति


श्री शंकराचार्य विरचित संस्कृत स्तोत्र का भावानुवाद
युमना तट पर वृन्दावन में मनभावन एक बाग़ हरी
कल्पदुम तले खड़े है उसमे पैर मरोड़े श्याम हरी
घन श्याम हरी
चन्दन कर्पुत उटी में लिपटा तन कटी पीताम्बर सोहे
भया उजियारा विश्व ये सारा तेजस्वी प्रभु कांति से
कमल नयन आकर्ष कर्ण में कुण्डल सुंदर दो लटके
मुस्कान मन्द मुख की मोहे चमके कोस्तुभ सीने पे 
दमके अंगूठी ऊँगली में झूले वर्णमाला गले
देखत तेज महाप्रभु का कापन कलि काल भी लागे
हृषिकेश कुंतल से निकले गंध से मोहित गूजे भंवरे
गोप संग श्याम कुञ्ज में जेवे आओ प्रभु को नमन करे
भरे सुगंध मंदार समां में आनंदित मन आनंद दाता से
गंगापद आनंद निधि को करे परणाम महापुरुष को
फेले प्रीत दश दिशाओ में गोप्रिये गोपाल की कांति से
देवप्रिया देत्यारि हरी के हो नत मस्तक पड़ युग्मो में

Friday, 13 November 2015

श्री राधा कृष्ण अर्पित


मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है।
करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है॥

पतवार के बिना ही, मेरी नाव चल रही है।
हैरान है ज़माना, मंजिल भी मिल रही है।
करता नहीं मैं कुछ भी, सब काम हो रहा है॥

तुम साथ हो जो मेरे, किस चीज की कमी है।
किसी और चीज की अब, दरकार ही नहीं है।
तेरे साथ से गुलाम अब, गुलफाम हो रहा है॥

मैं तो नहीं हूँ काबिल, तेरा पार कैसे पाऊं।
टूटी हुयी वाणी से गुणगान कैसे गाऊं।
तेरी प्रेरणा से ही सब यह कमाल हो रहा हैं॥

Saturday, 31 October 2015

जन्म तेरा बातों मे बीत गयो

जन्म तेरा बातों मे बीत गयो
जन्म तेरा बातों में बीत गयो , तूने कबहूँ न कृष्ण कह्यो ॥
पाँच बरसका भोला- भाला , अब तो बीस भयो ,
मकरपचीसी माया कारण , देस बिदेस गयो ॥१॥
जनम तेरा.....||
तीस बरस की अब मति उपजी , लोभ बढ़े  नित नयो ,
माया जोड़ी लाख करोरी , अजहुँ न तृप्त भयो ॥२॥
जनम तेरा.....||
वृद्ध भयो तब आलस उपजी, कफ नित कंठ रह्यो,
संगत कबहुँ न कीनी तूने , व्यर्था में जन्म गयो ॥३॥
जनम तेरा.....||
ये संसार मतलब का लोभी , झूठा ठाठ रचयो ,
कहत कबीर समझ मन मूरख , तू क्यूं भूल गयो ॥४॥
जनम तेरा.....||

Saturday, 10 October 2015

मधुराष्टकं भावार्थ सहित-- श्रीमद् वल्लभाचार्य रचित मधुराष्टकम

अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम्।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।
आपके होंठ मधुर हैं, आपका मुख मधुर है, आपकी ऑंखें मधुर हैं,
आपकी मुस्कान मधुर है, आपका हृदय मधुर है, आपकी चाल मधुर है,
मधुरता के राजा श्रीकृष्ण आपका सब कुछ मधुर है ॥1॥

वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरम्।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।
आपका बोलना मधुर है, आपका चरित्र मधुर है, आपके वस्त्र मधुर हैं, आपके वलय मधुर हैं, 
आपका चलना मधुर है,आपका घूमना मधुर है, मधुरता के राजा श्रीकृष्ण आपका सब कुछ मधुर है ॥2॥

वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।
आपकी बांसुरी मधुर है, आपके लगाये हुए पुष्प मधुर हैं, आपके हाथ मधुर हैं,आपके चरण मधुर हैं ,
आपका नृत्य मधुर है, आपकी मित्रता मधुर है, मधुरता के राजा श्रीकृष्ण आपका सब कुछ मधुर है ॥3॥

गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम् ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।
आपके गीत मधुर हैं,.आपका पीताम्बर मधुर है, आपका खाना मधुर है, आपका सोना मधुर है, 
आपका रूप मधुर है, आपका टीका मधुर है, मधुरता के राजा श्रीकृष्ण.आपका सब कुछ मधुर है ॥4॥

करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं रमणं मधुरम्।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।
आपके कार्य मधुर हैं,आपका तैरना मधुर है,आपका चोरी करना मधुर है, आपका प्यार करना मधुर है, 
आपकेशब्द मधुर हैं, आपका शांत रहना मधुर है, मधुरता के राजा श्रीकृष्ण आपका सब कुछ मधुर है ॥5॥

"जय श्रीकृष्णा"